शनिवार, 3 अगस्त 2013

बुला रहा है कौन मुझे चिलमनों के उस तरफ ,
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेक़रार है 

शुक्रवार, 8 जून 2012

बुधवार, 6 जून 2012

गुरुवार, 31 मई 2012

मोह मछलियों का अब छोड़

जाल-समेटा करने में भी 
समय लगा करता है, माँझी, 
मोह मछलियों का अब छोड़। 

सिमट गई किरणें सूरज की, 
सिमटीं पंखुड़ियाँ पंकज की, 
दिवस चला छिति से मुँह मोड़। 

तिमिर उतरता है अम्बर से, 
एक पुकार उठी है घर से, 
खींच रहा कोई बे-डोर। 

जो दुनिया जगती, वह सोती; 
उस दिन की सन्ध्या भी होती, 
जिस दिन का होता है भोर। 

नींद अचानक भी आती है, 
सुध-बुध सब हर ले जाती है, 
गठरी में लगता है चोर। 

अभी क्षितिज पर कुछ-कुछ लाली, 
जब तक रात न घिरती काली, 
उठ अपना सामान बटोर। 

जाल-समेटा करने में भी, 
वक़्त लगा करता है, माँझी, 
मोह मछलियों का अब छोड़। 

मेरे भी कुछ कागद-पत्रे, 
इधर-उधर हैं फैले-बिखरे, 
गीतों की कुछ टूटी कड़ियाँ, 
कविताओं की आधी सतरें, 
मैं भी रख दूँ सबको जोड़।

रविवार, 20 मई 2012

मनुष्य और सर्प

चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग
फट कुरुक्षेत्र में खेल रही, नर के भीतर की कुटिल आग
बजिओं गजों के लोथों पर, गिर रहे मनुज के छिन्न अंग
बह रहा चतुशपद और द्विपद का रुधिर मिश्र हो एक संग

गतवर गर्य रुधर भूधर से लिए रक्त रंजित शरीर
थे झूज रहे कोंते कर्ण षण षण करते गर्जन गंभीर
दोनों रणकुशल धनुर्धर नर, दोनों संबल दोनों समर्थ
दोनों पर दोनों की अमोघ थी, वृशिख वृष्टि हो रही व्यर्थ

इतने में शर के लिए कर्ण ने देखा जो अपना निषंग
उसमे से फुफकार उठा कोई प्रचंड विषधर भुजंग 
कहा कर्ण "मै अश्वसेन विश्रित भुजंगो का स्वामी हूँ,
जन्म से पार्थ का परम शत्रु, तेरा प्रतिबल हित्गामी हूँ
कर कृपा चढ़ श्रव्य पर, मुझे पर्थ तक जाने दे
इस महाशत्रु को अभी यही स्पंदन में मुझे सुलाने दे

कर वामन गरल जीवन भर का, संचित प्रतिशोध उतारूंगा
तू मुझे सहारा दे बढकर, मैं अभी पर्थ को मारूंगा"
राधे जरा हंसकर बोला "रे कुटिल बात क्या कहता है
जय का समस्त साधन नर की अपनी बाहों में रहता है"

उसपे भी सर्पो से मिलकर, मै मनुज मनुज से युद्ध करूं
जीवन भर जो निष्ठा पाली उसके आचरण विरुद्ध करूं
संसार कहेगा जीवन का सब सुकृत कारन ने क्षार किया
प्रतिभात के वध के लिए नीच ने सर्पो का सहाय लिया

रे अश्वसेन तेरे अनेक वंशज हैं छुपे नरों में भी
बसते वनों में ही नहीं बसते कुल, ग्राम, घरों मे भी
ये नर भुजंग मानवता का पथ कठिन बहुत कर देते हैं
प्रतिभट के वध के लिए नीच सहाय सर्प का लेते है

अर्जुन है मेरा परम शत्रु पर वेह सर्प नहीं नर ही तो है
संगर्ष सनातन नहीं शत्रुता इस जीवन भर ही तो है
जा भाग मनुज का सहज शत्रु मित्रता न मेरी पा सकता
में किसी हेतु भी यह कलंक अपने सर नहीं लगा सकता

रविवार, 15 अप्रैल 2012

आग की भीख - रामधारी सिंह दिनकर



धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ
मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है
अरमान आरजू की लाशें निकल रही हैं
भीगी खुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ
आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ
बेचैन जिन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

सवाल है ये, जवाब दो तुम .

सवाल है ये, 
जवाब दो तुम ,
सवाल है तो, जवाब  होगा
जवाब का कुछ हिसाब होगा
हिसाब गर बेहिसाब हुआ 
तो उसमें कुदरत का राज़ होगा 

सवाल है ये, जवाब दो तुम .


रखरखाव