रविवार, 24 मई 2020

रखरखाव

तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था
कोई न जान सका, रखरखाव ऐसा था।

-कृष्ण बिहारी 'नूर '

सोमवार, 28 मार्च 2016

Always

Flowers, Always

BY CATE MARVIN
Inexplicable, the sign outside a deli scrawled
with FLOWERS and below that: ALWAYS.
But there were no flowers. And I have never
seen an Always. I would like to, and I have looked.
I have kept my eye keen for Always, 
have liked its idea like an expensive purse, 
coveting it as it appears, 
riding the arms of rich ladies who are so very lady.
I've rolled on velvet cushions where I heard Always slept,
and I once tried to kiss Always,
but I don't think it was the Always
I was looking for.
I like your Always, it looks
such a demanding pet. It looks like it kisses
nice and soft.
It looks like the bruise I found flowering on my knee.
I fell down at your voice.
Not to worry, I got right back up, walked ten
more blocks and by then I was halfway home.
I knock my knees blue and scabbed crawling
toward you, wanting flowers,
 and always, always, always
to slide against the cold vinyl of a car's seat,
your pale hands on the bare backs of my legs,
that's one Always I want, and whoever knew
there were so many species of Always? 
Your bare hands on the pale backs
of my thighs, printing bruise,
and if you said Flowers, said Always and we
could erect a forever 
of something like sheets and breakfast and an ordinary
day, my eyes would  always slide across the table toward you,
 to warm their twin marbles in your palm, my face would flower for you daily, 
so that when we die, roses might petal themselves out our throats.

शनिवार, 12 मार्च 2016

Prayer

Prayer

BY FRANCISCO X. ALARCÓN
TRANSLATED BY FRANCISCO ARAGÓN
I want a god
as my accomplice
a god
who whistles
through the streets
and trembles
before the lips
of his lover

a god
who waits in line
at the entrance
of movie houses
and likes to drink
café au lait

a god
who hurts
to the last
bone and
bites the air
in pain

I want a
more godlike
god

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

दो -चार साल बाद

घर में जो एक ताख था ऊँचा नहीं रहा।
दो -चार साल बाद जो मैं अपने घर गया। 

कुछ न बोले तो.....

कुछ न बोले तो कहानी में बदल जाएंगे।
आग बुझ जाएगी, पानी में बदल जाएंगे।
क्यों ये तारीख भला याद रखेगी हमको,
हम भी क़िस्सा-ए-फानी में बदल जाएंगे। 

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

Read this somewhere

अन्याय सह कर बैठे रहना, यह महा दुष्कर्म है। 
न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है। 
इस हेतु ही तो कौरवों और पांडवों का रण हुआ। 
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ। 

शनिवार, 3 अगस्त 2013

कभी रस्ते में मिल जाओ तो कतरा कर गुज़र जाना।
हमें इस तरह तकना जैसे पहचाना नहीं तुमने।
हमारा ज़िक्र जब आए तो यूँ अनजान बन जाना।
हमारा नाम सुनकर भी हमें जाना नहीं तुमने। 
बुला रहा है कौन मुझे चिलमनों के उस तरफ ,
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेक़रार है 

शुक्रवार, 8 जून 2012

बुधवार, 6 जून 2012

गुरुवार, 31 मई 2012

मोह मछलियों का अब छोड़

जाल-समेटा करने में भी 
समय लगा करता है, माँझी, 
मोह मछलियों का अब छोड़। 

सिमट गई किरणें सूरज की, 
सिमटीं पंखुड़ियाँ पंकज की, 
दिवस चला छिति से मुँह मोड़। 

तिमिर उतरता है अम्बर से, 
एक पुकार उठी है घर से, 
खींच रहा कोई बे-डोर। 

जो दुनिया जगती, वह सोती; 
उस दिन की सन्ध्या भी होती, 
जिस दिन का होता है भोर। 

नींद अचानक भी आती है, 
सुध-बुध सब हर ले जाती है, 
गठरी में लगता है चोर। 

अभी क्षितिज पर कुछ-कुछ लाली, 
जब तक रात न घिरती काली, 
उठ अपना सामान बटोर। 

जाल-समेटा करने में भी, 
वक़्त लगा करता है, माँझी, 
मोह मछलियों का अब छोड़। 

मेरे भी कुछ कागद-पत्रे, 
इधर-उधर हैं फैले-बिखरे, 
गीतों की कुछ टूटी कड़ियाँ, 
कविताओं की आधी सतरें, 
मैं भी रख दूँ सबको जोड़।

रविवार, 20 मई 2012

मनुष्य और सर्प

चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग
फट कुरुक्षेत्र में खेल रही, नर के भीतर की कुटिल आग
बजिओं गजों के लोथों पर, गिर रहे मनुज के छिन्न अंग
बह रहा चतुशपद और द्विपद का रुधिर मिश्र हो एक संग

गतवर गर्य रुधर भूधर से लिए रक्त रंजित शरीर
थे झूज रहे कोंते कर्ण षण षण करते गर्जन गंभीर
दोनों रणकुशल धनुर्धर नर, दोनों संबल दोनों समर्थ
दोनों पर दोनों की अमोघ थी, वृशिख वृष्टि हो रही व्यर्थ

इतने में शर के लिए कर्ण ने देखा जो अपना निषंग
उसमे से फुफकार उठा कोई प्रचंड विषधर भुजंग 
कहा कर्ण "मै अश्वसेन विश्रित भुजंगो का स्वामी हूँ,
जन्म से पार्थ का परम शत्रु, तेरा प्रतिबल हित्गामी हूँ
कर कृपा चढ़ श्रव्य पर, मुझे पर्थ तक जाने दे
इस महाशत्रु को अभी यही स्पंदन में मुझे सुलाने दे

कर वामन गरल जीवन भर का, संचित प्रतिशोध उतारूंगा
तू मुझे सहारा दे बढकर, मैं अभी पर्थ को मारूंगा"
राधे जरा हंसकर बोला "रे कुटिल बात क्या कहता है
जय का समस्त साधन नर की अपनी बाहों में रहता है"

उसपे भी सर्पो से मिलकर, मै मनुज मनुज से युद्ध करूं
जीवन भर जो निष्ठा पाली उसके आचरण विरुद्ध करूं
संसार कहेगा जीवन का सब सुकृत कारन ने क्षार किया
प्रतिभात के वध के लिए नीच ने सर्पो का सहाय लिया

रे अश्वसेन तेरे अनेक वंशज हैं छुपे नरों में भी
बसते वनों में ही नहीं बसते कुल, ग्राम, घरों मे भी
ये नर भुजंग मानवता का पथ कठिन बहुत कर देते हैं
प्रतिभट के वध के लिए नीच सहाय सर्प का लेते है

अर्जुन है मेरा परम शत्रु पर वेह सर्प नहीं नर ही तो है
संगर्ष सनातन नहीं शत्रुता इस जीवन भर ही तो है
जा भाग मनुज का सहज शत्रु मित्रता न मेरी पा सकता
में किसी हेतु भी यह कलंक अपने सर नहीं लगा सकता

रविवार, 15 अप्रैल 2012

आग की भीख - रामधारी सिंह दिनकर



धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ
मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है
अरमान आरजू की लाशें निकल रही हैं
भीगी खुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ
आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ
बेचैन जिन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

सवाल है ये, जवाब दो तुम .

सवाल है ये, 
जवाब दो तुम ,
सवाल है तो, जवाब  होगा
जवाब का कुछ हिसाब होगा
हिसाब गर बेहिसाब हुआ 
तो उसमें कुदरत का राज़ होगा 

सवाल है ये, जवाब दो तुम .


रविवार, 29 जनवरी 2012

अरे अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है !



गहन सघन मनमोहक वन तरु, मुझको आज बुलाते हैं,
किन्तु किये जो वायदे मैंने, याद मुझे वो आते हैं,
अरे कहाँ आराम बदा यह मूक निमंत्रण छलना है,
अरे अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है .


Harivansh Rai Bachan's adaptation of Robert Frost's famous lines-
The wood's are lovely, dark and deep.
But I have promises to keep,
And miles to go before I sleep,
And miles to go before I sleep.



रविवार, 15 जनवरी 2012

piya tora kaisa abhiman

These are the lines that are read in a song from the movie raincoat. I just love them and couldn't find them on google. So, here they are-


किसी मौसम का झोंका था,
जो इस दीवार पे लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है.


गए मौसम में यह दीवारें यूँ सीली नहीं थीं,
न जाने इस दफा क्यूँ इनमें सीलन आ गई है, दरारें पड़ गई हैं .
और सीलन इस तरह बहती है जैसे,
खुश्क रुखसारों पे गीले आँसूं चलते हैं.


ये बारिश गुनगुनाती थी, इसी छत की मुंडेरों पर,
ये घर की खिडकियों के कांच पर ऊँगली से लिख जाती थी संदेशे.
सिसकती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानों के पीछे.


दोपहरें ऐसी लगती हैं,
बिना मोहरों के खली खाने रखे हैं.
न कोई खेलना वाला है बाज़ी,
न कोई चालें चलता है.


न दिन होता है अब, न रात होती है.
सभी कुछ रुक गया है.
वो क्या मौसम का झोंका था,
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है ?



शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

Mushkil Hai apna mel



Mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,
tum MA 1st division ho, main hua matric phel priye,
mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,
tum fauji afsar ki beti, main to kisaan ka beta hoon,
tum rabadi kheer malai ho, main to sattu sapreta hoon,
tum AC ghar mein rahti ho, main ped ke neeche leta hoon,
tum nai maruti lagti ho, main scooter lambreta hoon,
is kadar agar hum chup-chup kar aapas me prem badhayenge,
to ek roz tere daddy Amrish Puri ban jaaenge,
sab haddi pasli tod mujhe bhijwaa denge vo jail priye,

mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,

tum arab desh kee ghodi ho, main hoon gadahe ki naal priye,
tum deewali ka bonus ho, main bhookho ki hadtaal priye,
tum heere jadi tashtari ho, main almunium ka thaal priye,
tum chicken-soop biryani ho, main kankad waali daal priye,
tum hiran-chaokadi bharti ho, main hoon kachue ki chaal priye,
tum chandan-wan ki lakdi ho, main hoon babool ki chaal priye,
main pake aam sa latka hoon, mat maaro mujhe gulel priye,

mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,

main shani-dev jaisa kuroop, tum komal kanchan kaya ho,
main tan-se man-se Kanshi Ram, tum maha chanchala maya ho,
tum nirmal paawan ganga ho, main jalta hua patanga hoon,
tum raaj ghaat ka shanti march, main hindu-muslim danga hoon,
tum ho poonam ka taajmahal, main kaali gufa ajanta ki,
tum ho vardaan vidhata ka, main galti hoon bhagvanta ki,
tum jet vimaan ki shobha ho, main bus ki thelam-thel priye,

mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,

tum nai videshi mixi ho, main patthar ka silbatta hoon,
tum AK-saintalis jaisi, main to ik desi katta hoon,
tum chatur Rabadi Devi si, main bhola-bhala Lalu hoon,
tum mukt sherni jangal ki, main chidiyaghar ka bhaalu hoon,
tum vyast Sonia Gandhi si, main V.P.Singh sa khali hoon,
tum hansi Madhuri Dixit ki, main policeman ki gaali hoon,
kal jel agar ho jaaye to dilwa dena tum bail priye,

mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,

main dhabe ke dhaanche jaisa, tum paanch sitara hotel ho,
main mahue ka desi tharra, tum red-label ki botal ho,
tum chitra-haar ka madhur geet, main krishi-darshan ki jhaadi hoon,
tum vishva-sundari si kamaal, main teliya chaap kabadi hoon,
tum sony ka mobile ho, main telephone waala hoon chonga,
tum machli maansarovar ki, main saagar tat ka hoon ghongha,
dus manzil se gir jaaooga, mat aage mujhe dhakel priye,

mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,

tum satta ki maharani ho, main vipaksha ki lachari hoon,
tum ho mamta-Jailalita si, main kwara Atal-Bihari hoon,
tum Tendulkar ka shatak priye, main follow on ki paari hoon,
tum getz, matiz, corolla ho main Leyland ki lorry hoon,
mujhko refree hi rehne do, mat khelo mujhse khel priye,
mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye,
main soch raha ki rahe hain kabse, shrota mujhko jhel priye,

mushkil hai apna mel priye, ye pyar nahin hai khel priye

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

Gori Bethi Chhatt Par

Something I found while procrastinating at work. Couldn't help sharing it. The situation is that a young woman is on the roof of a house trying to jump and kill herself. Here are parodies of some of greatest hindi poets on this situation.


मैथिली शरण गुप्त 
अट्टालिका पर एक रमणी अनमनी सी है, अहो !
किस वेदना के भार से, संतप्त हो देवी, कहो ?
धीरज धरो संसार में, किसके नहीं दुर्दिन फिरे,
हे राम रक्षा कीजिये, अबला न भूतल पर गिरे.


सुमित्रा नंदन पन्त 
स्वर्ण-सौंध के रजत शिखर पर,
चिर नूतन, चिर सुन्दर प्रतिपल,
उन्मन उन्मन, अपलक नीरव,
शशि-मुख पर कोमल कुंतल-पथ,
कसमस-कसमस चिर यौवन घात,
पल पल प्रतिपल,
चल चल करती निर्मल दृग जल,
ज्यों निर्झर के दो नीलकमल,
यह रूप चपल ज्यों धुप धवल,
अतिमौन कौन,
रूपसी बोलो,
प्रिये बोलो ना.


गोपाल प्रसाद व्यास 
छत पर उदास क्यूँ बैठी है,
तू मेरे पास चली आ री,
जीवन का सुख-दुःख कट जाए,
कुछ मैं गाऊं, कुछ तू गा री,
तू जहाँ कहीं भी जाएगी, 
जीवन भर कष्ट उठाएगी,
यारों के साथ रहेगी तो,
मथुरा के पेड़े खाएगी.


श्याम नारायण पाण्डेय
ओ घमंड घमंदिनी,
अखंड खंड खंडिनी,
वीरता विमंदिनी,
प्रचंड चंड चंदिनी 
सिंहन के थान से,
आन बान शान से,
मान से, गुमान से,
तुम गिरो मकान से,
तुम डगर-डगर गिरो,
तुम नगर-नगर गिरो,
तुम गिरो अगर गिरो,
शत्रु पर मगर गिरो.


रामधारी सिंह दिनकर 
दग्ध ह्रदय में धधक रही,
उत्पात प्रेम की ज्वाला, 
हिमगिरी के उत्स निचोड़,
फोड़ पाताल, बनो विकराला,
ले ध्वन्सो के निर्माण त्रान से,
गोद भरो पृथ्वी की,
छत पर से मत गिरो,
गिरो अम्बर से वज्र सरीखी.


काका हाथरसी 
गोरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार,
नीचे पक्का फर्श है, भली करे करतार,
भली करे करतार, ना दे दे कोई धक्का, 
ऊपर मोती नार के नीचे पतरे कक्का.
कह काका कविराय, आरी मत आगे बढ़ना,
उधर कूदना मेरे ऊपर मत गिर पड़ना.



Gopal Prasad Neeraj:
Ho na udaas roopsi, tu muskarati jaa,
Maut mein bhi jindagi ke phool khilati ja.
Jana to har ek ko ek din jahaan se,
jaate - jaate mera ek geet gungunati ja 

Maithili Sharan Gupt:
Attalika par ek ramani anmani si hai aho,
Kis vedna ke bhaar se , santapt ho devi kaho,
Dheeraj dharo sansaar mein kiske nahi durdin fire,
He ram raksha kijiye abla na bhutal par gire.

Sumitranandan Pant:
Swarn-saundh ke rajat shikhar par,
chir nutan chir sundar pratipal,
Unman-unman, aplak neerav,
Shashi-mukh par komal kuntal-path,
Kasmas-kasmas chir youvan ghat,
Pal pal pratipal
Chal chal karti nirmal drag jal
jyon nirjhar ke do neelkamal,
yah roop chapal jyon dhoop dhawal,
Atimoun koun,
Roopsi bolo,
Priye bolo na.

Gopal Prasad Vyas:
Chat Par udaas kyon baithi hai,
tu mere paas chali aa ri,
Jeevan ka sukh dukh kat jaaye,
kuch main gaaun, kuch tu gaa ri,
Tu jahan kahin bhi jaayegi,
jeevan bhar kasht uthaayegi,
Yaaron ke sath rahegi to,
Mathura ke pede khaayegi.

Shyamanarayan Pandey:
O ghamand ghamandini,
Akhand khand-khandini,
Veerta Vimandini,
Prachand chand chandini,
Sinhan ke thaan se,
aan baan shaan se,
maan se , gumaan se
tum giro makaan se,
tum dagar dagar giro,
tum nagar-nagar giro,
tum giro agar giro,
shatru par magar giro,

Ramdhari singh Dinkar:
Dagdh hriday mein dhadak rahi,
utpat prem ki jwala,
himgiri ke uts nichod, fod
pataal bano vikrala,
le dhwanso ke nirmaan traan se,
god bharo prithvi ki.
Chat par se mat giro
giro ambar se vajra sarikhi.


Kaka hathrasi:
Gori baithi chat par, koodan ko taiyaar,
neeche pakka farsh hai, bhali kare kartaar,
bhali kare kartaar, na dede koi dhakka,
upar moti naar ki neeche patre kakka,
kah kaka kaviray, ari mat aage badhna,
udhar koodna, mere upar mat gir padna.


रविवार, 3 अक्टूबर 2010

The Outsider

After a long, it's a book which was mesmerizing not because of the beauty of the narrative but by the strength of the story. The language is as plane as what I would use but the story really resonates at some level (I guess)with everyone.

रखरखाव